peshawar terror attack, child genocide

गुलाम

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गुलाम
पेशावर में जो मरते केवल तीन बच्चे
निवाला हलक से फिसल जाता फिर से
पानी मीठा, मीठा रहता
आभासी दुनिया में तस्वीरें अलग होती
किश्तों में मौतें सुपाच्य हो चुकीं हैं
ये सौ बच्चों का साथ मरना खलता है
वैसे देखो अगर तो मरा है एक ही बच्चा
सौ अलग अलग घरों में
पर सौ बच्चों के साथ मरने से हमें जो दुःख है, संताप है
पीड़ा है, बेरंग सुबहें, उदास शाम है
तू ही देख, रे मोरे साथी!
सदियाँ बीत गयी हैं फिर भी
हम आकड़ों के गुलाम थे
हम आकड़ों के गुलाम है!
- पुष्कर
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