माँ

Share on Facebook39Share on Google+3Tweet about this on Twitter0Pin on Pinterest0Share on StumbleUpon0Share on LinkedIn1Email this to someone

 

 

माँ

maa

मेरी अच्छी सेहत की खातिर वो अपनी सेहत का कुछ ज़्यादा ख्याल रखती थी

मेरे स्पर्श को केवल वही महसूस कर सकती थी !

 

अपार दर्द सहकर मुझको इस दुनिया में लायी वो

उसके जीवन का वो एक लौता शंड था जब मुझे रोता देख मुस्काई  वो !

 

इस असहाए जीव को उसका ही सहारा था

मुझको अपनी ममता के साये में हर कष्ट से निकाला था !

 

थी जगी वो और आज भी जगती है रात रात भर

पीड़ा मेरी से ले लेती है वो अपनी झोली भर !

 

दिन भर मुझे संभाल कर कितना थक जाती होगी

और फिर रात को ख़ुशी ख़ुशी गीले बिस्तर पर सो जाती होगी !

 

तब चलना सीखा था थाम कर ऊँगली उसकी

आज भी सही राह दिखाती और विजय दिलाती है हर सलाह उसकी !

 

“लक्ष्मी सरस्वती दुर्गा” सब उसमे ही मिले मुझको

उसने “संस्कारो” और “विद्या” का अमूल्य ज्ञान दिया मुझको !

 

हो स्कूल  का या हो दफ्तर का वो पहला दिन

ना निकला था कभी घर से उसके आशीर्वाद वाले “दही -शक्कर ” के बिन !

 

जब न बोल पाता था और आज भी बखूबी पढ़ लेती है वो चेहरा मेरा

पल भर में ही दूर कर देती है अपने जादू से हो कोई भी डर मेरा !

 

इंतज़ार में उसकी निगाहें दरवाज़े पर टिकी रहती हैं

मैं जब तक घर ना लौटूं मेरी “माँ” “सजदे” में रहती है !

 

गुस्सा जब आता है तो वह खुद ही रो देती है

कुछ इस तरह मेरे “गुनाहों” को वो धो देती है !

 

जाने क्या “अध्भुत ” शक्ति खुदा ने हर औरत को दी है

जो जर लेती है बच्चों की पीड़ा वो केवल “माँ” ही है !

 

और “माँ” के इस क़र्ज़ को अदा किया जा ही नहीं सकता

उम्र भर की सेवा से भी विजय तू इस ऋण को चुका नहीं सकता !

 

-विजय

 

Share on Facebook39Share on Google+3Tweet about this on Twitter0Pin on Pinterest0Share on StumbleUpon0Share on LinkedIn1Email this to someone

Comments