courtesy- Pierre-Auguste Renoir - Sleeping Cat

छोटी कहानी – डरपोक बिल्ली

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* छोटी कहानी – डरपोक बिल्ली * 
गाँव के एक/दो घर में रहती थी एक डरपोक बिल्ली .
.रंग काला या सफ़ेद या फिर चमड़ी उधेड़ी हुई बिल्ली..गुर्राती थी ..पर प्रेम से..आक्रोश से गुर्राने पर उसके फर झड़ते थे
..फर जो उसके लिए आधी रात के सपनों में पंख थे ..बढ़ जाते थे अमरबेल की तरह और फिर हवा/अहवा ..हिचकते हुए हिचकोले लेते फड़फड़ाते दायरों से बाहर.
फिर पौं फटते जब सपना टूटता तो अपने पंख चाट चाट कर उसे गीला फर बनाती..ना उड़ पा सकने की सांत्वना देती खुद को बिल्ली.. पर सच तो बस इतना कि बिल्ली को उड़ना नहीं आता था.
यह बिल्ली डरपोक थी, डरती थी एक लम्बे सूखे चमड़े के टुकड़े से, रसोई की बर्तनों से, बिस्तरवाले कमरे के शोर से ,इंसानों की भँवों से, हाथ की लकीरों से ..कि कमबख्त छपते नहीं थे फरों पर फिर भी अमिट छाप छोड़ जाते
बिल्ली का दिन निर्धारित होता था घर रहते इंसानों की मनोदशा पर, मूड पर.
जो कोई खुश हो बहुत तो पुचकार देता था, जो दाल में नमक ज्यादा गिर जाए
तो खाने के साथ प्रेम से गुर्राती बिल्ली के कोड़ में एक लात पड़ती थी
पर बिल्ली डरपोक थी उसे अपने भूख से डर लगता था ..
क्या पता जो कहीं पेट भरे ना भरे
फिर एक दफा परिवार को संपत्ति का नुकसान हुआ..राशन जो कम हुआ घर पर
तो बिल्ली भूखी रहने लगी
शुरुआत के कुछेक दिन ..बिल्ली के पेट में दर्द था फिर धीमे धीमे आदत पड़ी भूखे गुर्राते सो जाने की..
अब बिल्ली खाना तलाशते आस पास मंडराने लगी
और एक दिन घर से बाहर कदम जैसे पड़े, सीमा उलंघन आरोप में खींच कर एक लात रसीद की गयी बिल्ली को,
बिल्ली हवा में थी ..सारे फर खड़े हो गए और गिरने की बजाय बिल्ली ने
उड़ने का निश्चय किया
तब से ज़मीन से तंग आ चुकी ये बिल्ली, ज़मीन पर नहीं उतरी है ..चील बाज़ कौव्वों से तेज़ उडती है ये बिल्ली.. दायरों का अर्थ भूल चुकी है.. भूख प्यास सब भूल चुकी है..
उसके फर हर नए सूरज पर चार गुना बढ़ जाते है.. धुप देखती है..लम्बी सांस लेती है बिल्ली और फिर फड़फड़ाती है अपने फरों को..उडती है..बस उडती रहती है.
हाँ! बिल्ली को उड़ना नहीं आता था
पर फिर मुझे भी तो नहीं!
उड़ते तो हम दोनो हैं!
बिल्ली अपनी कहानी में, मैं अपनी कहानी में..
- पुष्कर.
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